कूद गया मैं नादान 
क्या जानता था इस नदी की गहराई
कामयाबी की इमारतों में छिपी थी
बेबसी की गहरी खाई

एक बंद पुराने संदूक से मैंने
जब उन खतों से धूल हटायी
बरसों पिंजरे में बंद एक कबूतर ने
उड़ने की हसरत जताई

गुमशुदा हैं जो मेरी कामयाबी पर
वाहवाही के कसीदे पढ़ा करते थे
आज जब औंधे मुँह गिरा
तो सिर्फ़ माँ की दुआ काम आई

सोचता हूँ वो काग़ज़ की कश्ती
क्या आज तैरेगी इस तजुर्बे की नदी में
जिसमें डूबता रहा उम्र भर
किनारा मिला तो घर की याद आई