एक राज़ है मेरे ज़हन में
जो अंदर जल भी रहा है
और मोम की तरह पिघल भी रहा है
जैसे दवा में ज़हर
जो रगों में बह भी रहा है
और लहू पी भी रहा है
जैसे एक ही पेड़ के नीचे बैठे हों दो
एक बच्चा जो खेल भी रहा है
और मज़दूर जो थक कर सो भी रहा है
जैसे कलाई पर बँधी घड़ी का काँटा
जो हर पल साथ चल भी रहा है
और मुझसे आगे बढ़ भी रहा है
एक राज़ है मेरे ज़हन में…