मेरी पहचान
मेरे काम में थी,
मुश्किल बस ये थी,
मेरे काम की
अपनी कोई पहचान न थी।

बनता सौदागर
तो याद रखती दुनिया,
पर बन गया शायर
जिसकी नज़्में तो थीं
मगर अपनी कोई ज़ुबान न थी।

बरसों बिता दिए
काग़ज़ों को मनाते मनाते,
जानती कैसे दुनिया मुझे,
मेरे हाथों में कलम तो थी,
मगर लफ़्ज़ों में जान न थी।

जब याद आते ग़ालिब
और तलाश होते फ़ैज़,
तो लोग दस्तक देते मेरे दरवाज़े,
मेरे कमरे में किताबें तो कई थीं,
मेरी अपनी कोई दास्तान न थी।