ज़िंदगी की दोपहर
हमसे देखी नहीं जाती
क्या करें
ये जवानी की सुबह
हमसे छोड़ी नहीं जाती
दौड़ते थे शिद्दत से
जद्दोज़हद में हम
इस सफ़र की थकान
अब हमसे सही नहीं जाती
सपनों के लिए
जो छोड़ आए
हम गाँव अपना
इस शहर के शोर में
अब अपनी आवाज़ नहीं आती
कण कण जमा कर
मकान की नींव डाली थी हमने
मगर इस घरौंदे से
अब मिट्टी की ख़ुश्बू नहीं आती
तुम चले गए
बिना अलविदा किए
जब थे, अनसुनी थीं तुम्हारी बातें
वही बातें
अब हमसे भुलाई नहीं जातीं
ज़िंदगी की दोपहर
हमसे देखी नहीं जाती