तुम मेरे शव को ज़िंदा छोड़ आए,
जब ज़िंदा था, मरा छोड़ आए।

जानता हूँ, ज़ालिमों से हाथ मिलाया है मैंने,
तुम इस मज़लूम को अकेला छोड़ आए।

हर शाख़ पर आबाद थे घोंसले,
तुम सावन के बगीचों में आग लगा आए।

संगम का पानी दूध-सा सफ़ेद था कभी,
तुम यमुना की धार में मैल घोल आए।

ये इश्क़-मोहब्बत का खेल अब रास नहीं आता,
तुम मेरे ख़तों पर कालिख पोत आए।