रास्तों के पत्थर,
नादानी में भगवान लगते हैं।
ये मायावी दुनिया है, संभलना,
यहाँ मिट्टी के ढेर भी मकान लगते हैं।
अच्छे वक़्त की भीड़ को,
अपनों का साथ न समझना।
बारिश के गड्ढे भी,
एक झलक में आसमान लगते हैं।
तुम पूछना उन जंगलों से,
जिन्हें काट दिया शहरों की सड़कों ने।
पेड़ तो हैं बाकी अब भी,
घोंसलों के बिना बेजान लगते हैं।
दवा-दुआ जो मिले, लेते चलना,
जैसे भी हो, ख़बर देते रहना।
ये घर तुम्हारा है, भूलना मत,
तुम्हारे बिना ये चबूतरे वीरान लगते हैं।